क्या कोई समझ पाता ?
क्या कोई समझ पाता ?
बात
करनी थी।
पर क्या कोई समझ
पाता ?
गलती
हो गई मुझसे।
पर क्या कोई उस
गलती को सुधार पाता
?
वक्त
तो था मेरा।
पर क्या कोई उस वक्त को ला पाता?
शायद
ही कोई समझ पाता।
पर क्या कोई समझना
चाहता?
ये सवाल
तो मेरा था।
पर इस सवाल का
कोई जवाब दे पाता
?
वो गुज़रा हुआ पल ही
तो था।
पर क्या हर कोई
उसे रोक पाता?
सपनो
का आसमान ही तो था।
पर क्या हर कोई
उसे छू पाता?
ज़िंदगी की एक उम्मीद ही तो थी।
पर क्या हर कोई
उसे जिंदा रख पाता
?
सुनेरा बचपन
ही तो था।
पर क्या हर कोई
उसे संजो के रख पाता ?
पर क्या हर कोई
मैं को अलग रख
पाता ?
आखिर
मैं कौन था?
किसी
का सपना।
किसी
का गुरूर ।
किसी
की ज़िंदगी।
या सिर्फ मैं?
क्या हर कोई इसे समझ पाता ?
Comments
Post a Comment