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कुछ बातें….

  कुछ बातें …. किस बात को बयां करूं, आँखों के आँसू , या चेहरे की मुस्कान ॥ खुशी का लम्हा , या दुख के पल ॥ जीने की ख्वाहिश , या रोज़ मरने का ग़म ॥ उम्मीद की छोटी सी किरण ; या निराशा का घोर अंधेरा ॥ खुद को खाने वाली चुप्पी, या तसल्ली देने वाली झूठी बातें ॥ रात को दिखने वाले सपने; या उन सपनों का टूटना ॥ दिल को छूने वाले अल्फ़ाज़, या घायल करने वाले शब्द ॥ उन शब्दों की मिठास, या उनका चुभना ॥ दिखने वाले घाव , या उनकी गहराई ॥ बताने वाली तकलीफ , या महसूस होने वाली ॥ खुद को पहचानने की कोशिश, या ना पहचान पाने का अफ़सोस ॥ किसी को नजर ना आये तुम, या नज़रअंदाज़ किये गये हो तुम ॥  

सीखो……...

    “ सीखो……... की मुस्कुराना सीखो। की मुस्कुराना सीखो। दूसरों के लिए नहीं , अपने लिए। मुस्कुराना सीखो   दुनिया के लिए नहीं,   अपने आप के लिए । की मोहब्बत करना सीखो। इंसान से नहीं , बकायदा किताबों से करना सीखो ।   किसी चीज़ की उम्मीद न रखते हुए भी। सबको साथ रखना सीखो। वो जो तुमारा है, उसे अपना कहना सीखो।   ये जिंदगी छोटी सी है। इस जिंदगी को जीना सीखो। कि तारों को देखो, टिमटिमाना सीखो । अपनी खुद की रौशनी से , चारों ओर उजाला करना सीखो। अंधेरी रात का तुम चन्द्रमा बनना सीखो। रात की शीतल हवा को देखो। खुद अशांत रह कर भी , अपने मन को शांत रखना   सीखो । अगर गलती तुम्हारी हो तो झुक जाना   सीखो । पर बात अगर खुद पे आ जाये ना ? तो , अड़ जाना सीखो। कोई नहीं समझता तुम्हारी बात को ऐसे ही। तुम्हारी बात को तुम समझाना   सीखो।  कसके गले लगाना सीखो। अपने सपनों को, और आपने दागों को भी । अपनी गलतियों को ...

तुम काफी हो खुद के लिए.

                                                                                                                                             तुम काफी हो खुद के लिए. साथ निभाना है तो खुद का निभाना। उसका साथ देना ही क्यों ? जो तुम्हारे साथ के काबिल ही ना हो।   कोई जरूरत नहीं है किसी को भी तुम्हारी। तो कोई क्यों तुम्हारी जरूरत बने ? तुम खुद के लिए काफी हो।   आज वादा करो खुद से , कि। की चाहे कुछ भी हो जाए | हमेशा साथ निभाओगे। दूसरों का ही नहीं , खुद का भी।   जो लोक कहते हैं   की   | तुम्हारा तो साया भी साथ छोड़ देता है। ...

क्या कोई समझ पाता ?

                                                                               क्या कोई समझ पाता ? बात करनी थी। पर क्या कोई समझ पाता ?   गलती हो गई मुझसे। पर क्या कोई उस गलती को सुधार पाता ?   वक्त तो था मेरा। पर क्या कोई उस वक्त को ला   पाता ?   शायद ही कोई समझ पाता। पर क्या कोई समझना चाहता ?   ये सवाल तो मेरा था। पर इस सवाल का कोई जवाब दे पाता ?   वो गुज़रा हुआ पल ही तो था। पर क्या हर कोई उसे रोक पाता ?   सपनो का आसमान ही तो था। पर क्या हर कोई उसे छू पाता ?   ज़िंदगी की एक उम्मीद ही   तो  थी। पर क्या हर कोई उसे   जिंदा रख पाता ?   सुनेरा बचपन ही तो था। पर क्या हर कोई उसे संजो के रख पाता ?   ...